रसूल-ए-अकरम (स) और मुसलमानो के दो गिरोह
रसूल-ए-अकरम (स) और मुसलमानो के दो गिरोह
रसूल मक़बूल (स) मसजिद मदीना (1) में दाख़िल हुए तो उन की निगाह मुसलमानो के उन दो गिरोहों पर पड़ी जो हलक़ा बनाये हुए किसी काम में मशग़ूल थे। उन में से एक जमात इबादत और ज़िक्र-ए-इलाही में मसरूफ थी और दूसरा गिरोह तालीमों ताअल्लुम और सीखने सिखाने में सर गर्म था। पैग़म्बर इस्लाम (स) दोनों जमातों को देख कर बहुत खुश हुए और अपने करीब खड़े हुए असहाब को मुखातिब करते हुए कहा : " यह दोनों गिरोह नेक काम में मसरूफ हैं और इसमें कोई शक नहीं के दोनों गिरोह में शामिल अफ़राद नेकी और सआदत पर गामज़न हैं " - इस के बाद आ हज़रत (स) ने अपनी गुफ्तुगू का सिलसिलाह बढ़ाते हुए इरशाद फ़रमाया " लेकिन मैं लोगों की तालीम और उन्हें अक़लमंद बनाने के लिए भेजा गया हूँ " - यह जुमला अदा करते हुए रसूल मक़बूल (स) उस जमात की तरफ बढ़ गए जो तालीमो ताअल्लुम और सीखने सिखाने में मसरूफ थी। वहां पहुँच कर वह भी उन लोगों के साथ पूरी तरह सरगर्म हो गए।(2)
(1) - सदरे इस्लाम में मसजिद मदीना का इस्तेमाल सिर्फ फ़रीज़ा नमाज़ की अदाएगी ही के लिए नहीं किया जाता था बल्की उस दौर के मुसलमानो की जुमला समाजी और मज़हबी सरगर्मियों का मरकज़ येही मस्जिद थी। जिस वक़्त ज़रुरत महसूस होती के किसी क़िस्म का इज्तेमा किया जाये तो लोगों को इस मसजिद में जमा होने की दावत देदी जाती थी। और लोग वहां जमा होकर हर क़िस्म की अहम् इत्तेलात हासिल कर लिया करते थे। हर तरह के नए फैसले इसी मसजिद में किये जाते थे और उस के बाद उस का ऐलान भी कर दिया जाया करता था ताकि लोग उस से आगाह हो जाएं। मुस्लमान जब तक मक्के में रहे हर क़िस्म की समाजी सरगर्मी और आज़ादी से पूरी तरह महरूम थे। ना मज़हबी अमाल फ़राइज़ को आज़ादी के साथ अंजाम दे सकते थे और न उन्हें दीनी तालीमात हासिल करने की आज़ादी थी यह सूरत-ए-हाल काफी दिनों तक क़ायम रही यहाँ तक के इस्लाम ने अरबिस्तान के एक दुसरे इलाक़े पर अपना असर जमा लिया जिस का नाम यसरब था और वह बाद में मदीनतुल नबी यानि नबी के शहर के नाम से मशहूर हो गया। रसूल मक़बूल (स) ने शहर मदीना के लोगों की तजवीज़ पर और उन के अहादो पैमान मद्दे नज़र रखते हुए मक्का से हिजरत इख्तियार करली। धीरे धीरे सारे मुस्लमान हिजरत करके मदीना आ गये और उसी वक़्त से मुसलमानो को इस बात की आज़ादी मिल गई के वह अपनी मज़हबी सरगर्मियों में खुल कर हिस्सा लें। शहर मदीना पहुँचने के बाद रसूल मक़बूल (स) ने सब से पहला काम यह किया के एक माक़ूल जगह का इंतेखाब करके अपने असहाब की मदद से इस मसजिद की तामीर का काम पूरा किया।
(2) - किताब : सच्ची कहानियां (जिल्द अव्वल ) - शहीद अयातुल्ला मुरतज़ा मुताहिरी - सफा २२
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